राजा विक्रमादित्य और तांत्रिक । Vikram Aur Betaal

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Vikram Aur Betaal :-दोस्तों आज की कहानी विक्रम और एक तांत्रिक के बारेमे है। ये कहानी विक्रम और बेताल की पहला कहानी है। इसी तरह कहानी पढ़ने केलिए हमारे साथ जुड़े रहिये। और कहानी केसा लगा कमेंट के माध्यम से बता सकते हैं।

राजा विक्रमादित्य और तांत्रिक

बहतु समय पहले की बात है भारत में विक्रमादित्य नामक एक राजा थे। वे अपनी दयालुता और बुद्धिमानी के लिए जाने जाते थे। उनकी बहादूरी की खूब चर्चा हाती थी।

एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक तांत्रिक आया। उसने राजा को उपहारस्वरूप एक फल दिया। जिसे राजा ने सप्रेम स्वीकार किया। उस अनोखे तांत्रिक ने राजा से फल को राजकोष में रखने का अनुरोध किया।

अगले दिन तांत्रिक फिर आया और राजा को एक और फल देकर राजकोष में रखने का अनुरोध किया। सालों तक यही क्रम चला। एक दिन कोषाध्यक्ष ने आकर राजा को एक अजीबोगरीब घटना बताई।

राजा दौड़ता हुआ राजकोष पहुंचा। तांत्रिक के द्वारा दिए गए सारे फल कीमती रत्नों में बदल चुके थे। किसी को भी इतने बहुमूल्य रत्नों को देखकर अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। राजा और उसके मंत्री खुशी से फूले नहीं समा रहे थे।

अगले दिन तांत्रिक फिर आया। राजा ने अपने सिंहासन से उठकर आदरपूर्वक उसका नमन करते हुए कहा, “महात्मा जी, आपने दरबार में पधारकर हमारा तथा दरबार का मान बढ़ाया है। मुझे आशीर्वाद दें। बताइये मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?”

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तांत्रिक ने कहा, “मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है। पर हां, तुम मेरी एक मदद कर सकते हो…..।”

राजा विक्रमादित्य मदद मांगने वालों की हमेशा मदद करते थे। उसकी स्वीकृति पर तांत्रिक ने कहा, “घने जंगलों में एक पीपल का पेड़ है, उस पर एक शव लटका हुआ है। मुझे देवी को प्रसन्न करने के लिए उस शव की बलि देनी है। उस जंगल में जाने से लोग डरते हैं। तुम्हें अमावस की रात को उस जंगल में अकेले ही जाना होगा। क्या तुम मेरे लिए उस शव को ला पाओगे?”

राजा अमावस्या की रात को जंगल के लिए निकल पड़े। काली अंधेरी रात थी। जंगल में गहरा अंधकार था पर बिना विचलित हुए और बिना डरे, राजा आगे बढ़ते गए। जंगल के बीच में वे पीपल के पेड़ के पास पहुंचे। पेड़ के चारों ओर कंकाल, खोपड़ी और हडि्डयां जमीन पर बिखरी हुई थीं।

पेड़ पर उल्टा लटका हुआ एक सफ़ेद रंग का शव राजा को दिखाई दिया। राजा पेड़ पर चढ़ गए। उन्होंने शव को बड़ी तेजी से उतारा और नीचे उतर आए। उसे कंधे पर डालकर राजा वापस चलने लगे। अचानक शव हंसने लगा। उसे हंसता देखकर राजा को एक झटका लगा, पर बिना डरे उन्होंने अपना चलना जारी रखा।

शव ने पूछा, “तुम कौन हो?”
राजा ने कहा,”मैं राजा विक्रमादित्य हू।”
“आप कौन हैं?” राजा ने शव से पूछा।
शव ने कहा, “मैं बेताल हूं। तुम मुझे कहां ले जा रहे हो?”

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राजा ने बेताल को तांत्रिक की पूरी कहानी बता दी। कहानी सुनकर बेताल बोला, “मेरा और तांत्रिक का जन्म एक ही समय में हुआ था। अगर तांत्रिक मुझे प्राप्त कर लेगा, तो मुझे मारकर वह अपनी शक्ति बढ़ा लेगा और बाद में वह तुम्हें भी मार देगा। वह बहुत बड़ा धोखेबाज है।”

राजा सोच में पड़ गया। फिर बोला, “मैंने तांत्रिक से आपको लाने का वादा किया है। चाहे मेरी जान भी चली जाए, पर वादा निभाने के लिए मुझे आपको ले ही जाना पड़ेगा।”

बेताल राजा से प्रभावित हो गया और उसने राजा की मदद करने का निर्णय किया। वह राजा से बोला, “ठीक है, मैं तुम्हें कहानी सुनाकर अंत में प्रश्न पूछूंगा। अगर तुम्हारा उत्तर गलत हुआ तो तुम्हारे साथ चलूंगा, और अगर सही हुआ तो मैं वापस पेड़ पर चला जाऊंगा। अगर तुम चुप रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा…. क्या तुम्हें मंजूर है…?”

बेताल जानता था कि राजा बुद्धिमानी है और हमेशा सच बोलेंगे तथा सही उत्तर ही देंगे। विक्रमादित्य के पास राजी होने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था। बेताल ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की।

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